चाहता हूँ ( चाहती हूँ इस कविता के उत्तर में)

तेरे सपनो को जानता था मैं पहले से
अब तेरे सपनो को सच करना चाहता हूँ
यूँ तो बहुत कुछ कहना है
पर बिना कहे तुम समझ जाओ ये चाहता हूँ

तकदीर ने खेले ऐसे खेल
तेरे करीब होके भी चुप रहा
अब बात निकल ही गयी है
तो इकरार करना चाहता हूँ

तेरी आँखों में रोज़ देखता था
अब तेरी आँखों में खो जाना चाहता हूँ
तेरे पास बैठता था पहले भी
अब तुझे महसूस करना चाहता हूँ
सिर्फ नाम के लिए सो रहा था अब तक
नींद कहाँ थी आँखों में
अब तेरी आँखों में देखते देखते
चैन की नींद सोना चाहता हूँ.

रोज़ उठता हूँ अलार्म की आवाज़ सुनकर
अब "अजी सुनते हो?" की आवाज़ सुनकर उठाना चाहता हूँ
वैसे तो मैं किसी को हक जताने नहीं देता
पर तेरे प्यार के सामने सर झुकाना चाहता हूँ.


चाहती हूँ इस कविता के उत्तर में



Share/Save/Bookmark

0 comments:

Post a Comment

लिखो कुछ ऐसा के जिससे अपनेपण की खुशबू आये

मुहोब्बत के एहसास को
शब्दों में लिख रही हूँ
दिल की धडकनों की आवाज़
आप सब को सुना रही हूँ

***
एक ख्वाब हूँ मैं टूटा हुआ
एक ज़ख्म खरोंचा हुआ
एक लम्हा गुज़रा हुआ
एक आंसू छलका हुआ
एक एहसास दिल में दबा हुआ
एक ख्याल मन में छिपा हुआ

***
लबों की खामोशी भी
सुनाती है दास्ताँ कोई
हर मुस्कराहट के पीछे
छिपा है अश्क कोई